पाकीज़ह...!!!

पाकीज़ह सी शब् खिली थी
फलक पर सेज सजी थी तारों में,
गुम थी आँखों से नींद उस रात
एक चेहरा ढूंढ  रही थी नज़रें मीनारों में...!!!

ख्वाब जैसे रूठे थे
ज़ेहन में बस वही था बसा
गहरी ओस छायी थी अगली सुबह
मन कमला था प्यासा सा। ....

एक वजूद ढूंढ रहा मै वाहा
जाहा एक लम्हा बिता  था तेरे साथ
बून राहा था दिल ख्वाब अंजाने
समेट रहा पल जो  बिते तेरे साथ। ...

पूर्वा चली थी उस ओर से
जाहा तेरी ज़ुल्फ़ की महक बिख़री थी,
पाकीज़ह सी तेरी अदा
पाकीज़ह सी तेरी हँसी, जो बिख़री थी ....... अब हर जगह ........


 

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