खड़ा था आज अपने आईने के सामने,
कुछ लकीरें झलक रही थी,
मेरा ही चेहरा कुछ कह रहा था मुझसे
ज़रा देख ग़ौर से, क्या रही ख्वाहिस थी।
ले चली वो लकीरें पीछे,
समय से उलट दिषा में,
आ रहा था एक शक्श नज़र वाहा
खुश था अपने ही आयाम में।
मलंग था अपनी दुनिया में,
सपने देख रहा वो भी,
जो कभी बसे थे मेरी भी आखों में।
ख्वाब थे एक जैसे हमारे ,
सच करने थे वो सभि,
रेषों में बून कर,
संजोने थे वो सभि।
शायद ज़िम्मेदारियों से अंजान था,
या विश्वास या गुरूर था,
पूरी करने चला था सारी ख़्वाहिशें,
दिल भी उसका मगरूर था।
याद आज भी करता हूँ उस शक्श को,
जिसे छोड़ आया पीछे कहीं,
बस एक सवाल उठा है ज़ेहन में अब,
क्या वो मैं था या हूँ मैं अभी.... ..... .

Why always sad, melancholy, forlorn?
ReplyDeleteto be happy with the sadness is always a masala recipe of life. Next, there will be happy song...i promise..
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